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झरना (कविता) / जयशंकर प्रसाद

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जयशंकर प्रसाद की ‘झरना’ : समीक्षा  जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के छायावाद युग के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका काव्य-संग्रह ‘झरना’ हिंदी कविता के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसका प्रथम प्रकाशन 1918 ई. में हुआ और इसे छायावादी काव्यधारा के प्रारंभिक एवं प्रभावशाली ग्रंथों में गिना जाता है। इस संग्रह में प्रकृति, प्रेम, सौंदर्य, रहस्य, करुणा और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। ‘झरना’ में प्रकृति केवल दृश्य-वर्णन का माध्यम नहीं है, बल्कि कवि की भावनाओं और अंतर्मन की अभिव्यक्ति का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आती है। झरने का सतत प्रवाह जीवन की गति, संघर्ष और नवचेतना का संदेश देता है। प्रसाद ने प्रकृति के माध्यम से मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम, आशा और आत्मविश्वास को अत्यंत कलात्मक ढंग से व्यक्त किया है। इस काव्य-संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संगीतात्मक भाषा और चित्रात्मक शैली है। संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी भाषा मधुर, प्रवाहपूर्ण और भावपूर्ण है। उपमा, रूपक, मानवीकरण तथा अनुप्रास जैसे अलंकार कविता को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। प्रत्येक कविता पाठक के मन...