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शिव की कांवड़- मेरी कांवड़"

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शिव की कांवड़-  मेरी कांवड़" शिव की कांवड़,   तो मैं भी लाना चाहती हूँ।   मगर वो कांवड़ डीजे की धुन पर नहीं लाऊँगी।   बस "बोल बम" के नारे के साथ लाऊँगी। न घर की माँ को प्यासा छोडूंगी,   न भूखा।   पहले उनको मनाऊँगी,   उनके पांव छूकर आशीर्वाद लूंगी,   फिर "बोल बम" के नारे के साथ   तुझको रिझाऊँगी। न नशे में धुत रहूँगी, न गाली गलौच करुँगी।   न रास्ते जाम करुँगी, न किसी को परेशान करुँगी।   न मर्यादा छोडूंगी, न छोड़ने दूँगी। मेरी कांवड़ में शोर नहीं होगा भोले,   मेरी कांवड़ में मौन होगा।   मेरी कांवड़ में दिखावा नहीं होगा,   मेरी कांवड़ में समर्पण होगा। मैं कंधे पर गंगाजल नहीं,   अपने कर्म का जल लेकर आऊंगी।   जिसमें मेहनत घुली होगी,   जिसमें ईमानदारी मिली होगी। मैं मंदिर की सीढ़ियां नहीं गिनूंगी,   मैं अपने एक-एक कदम में तुझे पाऊंगी।   हर प्यासे को पानी पिलाकर,   हर भूखे को रोटी देकर,   तेरा ह...

बारिश(स्वरचित)

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बारिश की बूंदें और मैं एक दम एक जैसे लगते है न कोई शोर, न तमाशा बस मैं और मौसम का तकाज़ा। जहाँ बारिश की बूंदे,  जमीं छूने को बेकरार,  तो वहां मैं बारिश में  भीगने को बेकरार, दोनों की अपनी अपनी काशिश, दोनों ही खोने को आतुर मैं अपने आप में, और  बूंद मुझमें। भूल जाती हूँ मैं खुद को बारिश में भीगने के बाद शायद खुद से ही मिल आती हुँ हरबार। हाय, वो सुकून,वो बारिश की बूंदे  और मैं। गालों पर जब आती है,  एक एहसास से दे जाती है, कि आया है कोई मिलने मुझसे उस जहांन से, हाय वो लम्हा,बारिश और मै बारिश रुक जाती है, मगर मैं भीगती रहती हूँ, अपने  ख्यालों में।

तू लिख मेरी कामयाबी पर (स्वरचित)

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न तू मेरी मोहब्बत पर लिख, न बेवफ़ाई पर लिख। न खुशनसीबी पर लिख, न रुसवाई पर लिख। न तो मेरी शराफ़त पर लिख, न लिख मेरी बेहयाई पर लिख। लिखना है लिख मेरी कामयाबी पर। क्योंकि मोहब्बतें टूट जाती हैं, बेवफ़ाई के क़िस्से आम हैं। खुशनसीबी पल भर की है, रुसवाई ज़माने का काम है। शराफ़त को लोग कमज़ोरी समझें, बेहयाई पे उँगली उठाएँ। पर कामयाबी…? कामयाबी वो मुकाम है, जो सारे इल्ज़ाम धो देती है। वो आवाज़ है, जो सारी ख़ामोशी चीर देती है। तो छोड़ ये मोहब्बत-नफ़रत के पन्ने, मेरे किरदार के कच्चे किस्से। अगर कलम उठाई है मेरे लिए,

क्या हम आजाद है

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एक ऐसी कविता लिख पाऊं जो   *जगा दे, सोया नौजवान*   *बढ़ा दे, सम्मान*   *जो माँ, बहन, और बेटी का* *जो सिखाए - ताकत हाथ में नहीं*   *ताकत संस्कार में होती है*   *जो गिरे हुए को उठाए*   *और उठे हुए को झुकना सिखाए* *एक ऐसी कविता लिख पाऊं जो*   *घर की लक्ष्मी को देवी बनाए*   *गली के हर कोने को सुरक्षित बनाए*   *और हर माथे पर तिलक गर्व का लगवाए* *जब कलम चले तो ज़ालिम कांपे*   *और बेटी बिना डर के रात में भी चले*   *तब समझूंगीमेरी कलम सार्थक हुई*   *तब समझूंगी देश सच में बदल रहा है* *पर सवाल ये भी पूछूं *क्या हम आजाद हैं?*   *आजाद उस दिन होंगे,*   *जब भूख, भेद और डर से भी आजाद होंगे।*   *जब तिरंगा सिर्फ 15 अगस्त को नहीं,*   *रोज़ दिल में लहराएगा।* *जय हिंद 🇮🇳* Meenu Sharma (delhi)

आह-वेदना

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जयशंकर प्रसाद की कविता 'वेदना' जयशंकर प्रसाद की 'वेदना' छायावादी काव्यधारा की एक अत्यंत भावपूर्ण कविता है। इस कविता में कवि ने जीवन के दुःख, असफलताओं, निराशा और मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है। प्रसाद के लिए वेदना केवल पीड़ा नहीं, बल्कि आत्मबोध, जीवन-दर्शन और सृजन की प्रेरणा भी है। उनकी रचनाओं में वेदना व्यक्तिगत अनुभव से आगे बढ़कर समस्त मानवता की अनुभूति बन जाती है। कविता में कवि जीवन की क्षणभंगुरता, टूटी हुई आशाओं और संघर्षों का चित्र प्रस्तुत करता है। फिर भी यह वेदना निराशा का प्रतीक नहीं बनती, बल्कि मनुष्य को आत्मचिंतन और आध्यात्मिक ऊँचाई की ओर ले जाती है। कवि का मानना है कि दुःख मनुष्य के व्यक्तित्व को परिष्कृत करता है और उसे जीवन का वास्तविक अर्थ समझाता है। भाषा की दृष्टि से कविता अत्यंत कोमल, मधुर और प्रतीकात्मक है। प्रकृति-चित्रण, मानवीकरण तथा रूपक जैसे अलंकार कविता की भाव-गहनता को और प्रभावशाली बनाते हैं। छायावादी शैली के अनुरूप इसमें कल्पना, रहस्यात्मकता और आत्मानुभूति का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। प्रसाद की काव्य-द...

झरना (कविता) / जयशंकर प्रसाद

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जयशंकर प्रसाद की ‘झरना’ : समीक्षा  जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के छायावाद युग के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका काव्य-संग्रह ‘झरना’ हिंदी कविता के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसका प्रथम प्रकाशन 1918 ई. में हुआ और इसे छायावादी काव्यधारा के प्रारंभिक एवं प्रभावशाली ग्रंथों में गिना जाता है। इस संग्रह में प्रकृति, प्रेम, सौंदर्य, रहस्य, करुणा और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। ‘झरना’ में प्रकृति केवल दृश्य-वर्णन का माध्यम नहीं है, बल्कि कवि की भावनाओं और अंतर्मन की अभिव्यक्ति का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आती है। झरने का सतत प्रवाह जीवन की गति, संघर्ष और नवचेतना का संदेश देता है। प्रसाद ने प्रकृति के माध्यम से मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम, आशा और आत्मविश्वास को अत्यंत कलात्मक ढंग से व्यक्त किया है। इस काव्य-संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संगीतात्मक भाषा और चित्रात्मक शैली है। संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी भाषा मधुर, प्रवाहपूर्ण और भावपूर्ण है। उपमा, रूपक, मानवीकरण तथा अनुप्रास जैसे अलंकार कविता को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। प्रत्येक कविता पाठक के मन...