बारिश(स्वरचित)

बारिश की बूंदें और मैं
एक दम एक जैसे लगते है
न कोई शोर, न तमाशा
बस मैं और मौसम का तकाज़ा।
जहाँ बारिश की बूंदे, 
जमीं छूने को बेकरार, 
तो वहां मैं बारिश में 
भीगने को बेकरार,
दोनों की अपनी अपनी काशिश,
दोनों ही खोने को आतुर
मैं अपने आप में, और 
बूंद मुझमें।
भूल जाती हूँ मैं खुद को
बारिश में भीगने के बाद
शायद खुद से ही मिल आती हुँ हरबार।
हाय, वो सुकून,वो बारिश की बूंदे 
और मैं।
गालों पर जब आती है, 
एक एहसास से दे जाती है,
कि आया है कोई मिलने मुझसे उस जहांन से,
हाय वो लम्हा,बारिश और मै
बारिश रुक जाती है, मगर
मैं भीगती रहती हूँ, अपने 
ख्यालों में।

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