हिमाद्रि तुंग शृंग
*1. कविता का परिचय*
"हिमाद्रि तुंग शृंग से" जयशंकर प्रसाद की देशभक्ति और प्रकृति-प्रेम से भरी प्रसिद्ध कविता है। यह कविता _'लहर'_ संग्रह में संकलित है। इसमें कवि ने हिमालय को भारत की आत्मा और संस्कृति का प्रतीक मानकर देश के गौरव का गान किया है।
*2. हिंदी में भावार्थ / व्याख्या*
*_"हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती"__
*अर्थ:* हिमालय के सबसे ऊंचे शिखर से, ज्ञान से प्रकाशित और पवित्र भारतभूमि स्वयं अपने प्रकाश से देदीप्यमान होकर स्वतंत्रता के लिए आवाज दे रही है। कवि कह रहे हैं कि भारत की आत्मा ही स्वतंत्रता मांग रही है।
__"अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो बढ़े चलो"__
*अर्थ:* हे अमर वीरों के पुत्रों! दृढ़ निश्चय करो और सोचो। तुम्हारे सामने पुण्य का, कल्याणकारी मार्ग खुला है। उसी पर आगे बढ़ते चलो। यह युवाओं को कर्म और संघर्ष का संदेश है।
__"असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ, विकीर्ण दिव्य दाह-सी,
सपूत मातृभूमि के, रुको न शूर साहसी"__
*अर्थ:* मातृभूमि के वीर सपूतों की असंख्य कीर्ति की किरणें दिव्य अग्नि की तरह चारों ओर फैल रही हैं। इसलिए हे शूरवीरों, रुको मत, आगे बढ़ो।
पूरी कविता में कवि ने हिमालय, गंगा, भारत के अतीत के गौरव का जिक्र करके वर्तमान पीढ़ी को जागने और देश के लिए काम करने की प्रेरणा दी है।
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*3. समीक्षा / विशेषताएं*
*A. भाव पक्ष*
1. *राष्ट्रप्रेम*: यह कविता केवल देशभक्ति नहीं है, बल्कि आत्मगौरव का उद्घोष है। कवि भारत को केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि जीवंत माँ मानते हैं।
2. *आह्वान और प्रेरणा*: "बढ़े चलो बढ़े चलो" - इस पंक्ति में अपूर्व शक्ति है। यह निष्क्रियता तोड़कर कर्म की ओर धकेलती है।
3. *प्रकृति और संस्कृति का संगम*: हिमालय को भारत की चेतना का प्रतीक बनाया गया है। प्रकृति के माध्यम से राष्ट्रीय भाव जगाया गया है।
*B. कला पक्ष*
1. *भाषा-शैली*: भाषा संस्कृतनिष्ठ, ओजपूर्ण और समासयुक्त है। शब्दों में दम है - "प्रबुद्ध", "समुज्ज्वला", "विकीर्ण"।
2. *छंद और लय*: गीतात्मक लय है। "बढ़े चलो बढ़े चलो" की आवृत्ति कविता को नारे जैसी शक्ति देती है।
3. *अलंकार*: अनुप्रास, रूपक और मानवीकरण का सुंदर प्रयोग। भारतभूमि को "स्वयंप्रभा" कहकर मानवीकृत किया गया है।
*C. प्रासंगिकता*
आज भी जब हम राष्ट्रीय संकट या चुनौती की बात करते हैं तो यह कविता नई ऊर्जा देती है। यह हमें याद दिलाती है कि हम एक गौरवशाली परंपरा के वारिस हैं।
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*4. निष्कर्ष*
"हिमाद्रि तुंग शृंग से" सिर्फ एक कविता नहीं, एक शंखनाद है। जयशंकर प्रसाद ने इसमें अतीत का गौरव, वर्तमान का कर्तव्य और भविष्य का संकल्प तीनों को एक साथ बाँध दिया है।
स्कूल-कॉलेज के मंचों से लेकर देशभक्ति के कार्यक्रमों तक आज भी यह कविता उतनी ही प्रासंगिक है।
*एक पंक्ति में:* _यह कविता सोते हुए राष्ट्र को जगाने का मंत्र है।*
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