शीर्षक: छायावाद के पुरोधा: महाकवि जयशंकर प्रसाद जी को शत-शत नमन*
शीर्षक: छायावाद के पुरोधा: महाकवि जयशंकर प्रसाद जी को शत-शत नमन*
कामायनी के सर्जक, आँसू के रचयिता, और हिंदी साहित्य को 'छायावाद' का गौरव देने वाले युग-पुरुष पंडित जयशंकर प्रसाद जी को सादर नमन।
जब भी हम पढ़ते हैं -
_"हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती"_
तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जब गुनगुनाते हैं -
_"अरुण यह मधुमय देश हमारा"_
तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
प्रसाद जी केवल कवि नहीं थे, वे एक दार्शनिक थे। उन्होंने 'कामायनी' के माध्यम से मनु, श्रद्धा और इड़ा के रूप में मन, भाव और बुद्धि का जो संघर्ष दिखाया, वह आज भी हर मनुष्य के भीतर चल रहा है। 'कामायनी' का अंतिम संदेश 'समरसता' आज के बिखरे हुए समाज के लिए सबसे बड़ी औषधि है।
'आँसू' में उन्होंने वेदना को इस तरह शब्द दिए कि हर टूटा हुआ दिल कह उठता है - _"यह मेरे ही आँसू हैं"_। 'स्कंदगुप्त' और 'चंद्रगुप्त' जैसे नाटकों से उन्होंने इतिहास को जीवित कर दिया।
छायावाद के इस स्तंभ ने हमें सिखाया कि कविता केवल तुकबंदी नहीं, आत्मा की आवाज़ है। प्रकृति का मानवीकरण, अंतर्मन की पीड़ा और राष्ट्रीय चेतना - इन तीनों को एक साथ पिरोने का हुनर सिर्फ प्रसाद जी के पास था।
आज जब हिंदी भाषा अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है, तब प्रसाद जी का साहित्य हमें याद दिलाता है कि हमारी भाषा कितनी समृद्ध, कितनी मधुर और कितनी गहरी है।
हे महाकवि, आपका एक-एक शब्द अमर है। आपने 'लहर', 'झरना', 'आँसू' देकर हिंदी को जो सौंदर्य दिया, उसके लिए साहित्य जगत सदैव आपका ऋणी रहेगा।
*विनम्र श्रद्धांजलि।*
_"ले चल वहाँ भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे"_
आपकी लेखनी की नाव आज भी हमें भाव-सागर में ले जाती है प्रसाद जी।
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