शिव की कांवड़- मेरी कांवड़"
शिव की कांवड़- मेरी कांवड़"
शिव की कांवड़,
तो मैं भी लाना चाहती हूँ।
मगर वो कांवड़ डीजे की धुन पर नहीं लाऊँगी।
बस "बोल बम" के नारे के साथ लाऊँगी।
न घर की माँ को प्यासा छोडूंगी,
न भूखा।
पहले उनको मनाऊँगी,
उनके पांव छूकर आशीर्वाद लूंगी,
फिर "बोल बम" के नारे के साथ
तुझको रिझाऊँगी।
न नशे में धुत रहूँगी, न गाली गलौच करुँगी।
न रास्ते जाम करुँगी, न किसी को परेशान करुँगी।
न मर्यादा छोडूंगी, न छोड़ने दूँगी।
मेरी कांवड़ में शोर नहीं होगा भोले,
मेरी कांवड़ में मौन होगा।
मेरी कांवड़ में दिखावा नहीं होगा,
मेरी कांवड़ में समर्पण होगा।
मैं कंधे पर गंगाजल नहीं,
अपने कर्म का जल लेकर आऊंगी।
जिसमें मेहनत घुली होगी,
जिसमें ईमानदारी मिली होगी।
मैं मंदिर की सीढ़ियां नहीं गिनूंगी,
मैं अपने एक-एक कदम में तुझे पाऊंगी।
हर प्यासे को पानी पिलाकर,
हर भूखे को रोटी देकर,
तेरा ही नाम जपती जाऊंगी।
क्योंकि मुझे पता है कैलाशपति,
तुझे जल की नहीं,
तेरे बंदों की सेवा चाहिए।
तुझे डीजे की नहीं,
तेरे नाम की सच्ची लगन चाहिए।
इसलिए मैं अपनी श्रद्धा के सुमन से,
अपने चरित्र के फूलों से,
तुझको मनाऊँगी।
न बैसाखी चाहिए मुझे, न सहारा।
बस तेरा नाम चाहिए और तेरा किनारा।
*बोल बम... बोल बम...*
पर पहले "बोल सच"।
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