ये घर अब भी तेरा है।( स्वरचित)

Titile-ये घर अब भी तेरा है


कोई तृषा, तो कोई स्नेहा  

कोई मीना, तो कोई गीता  

कितनी रूपकँवर  

सूली चढ़ जाती है,  

इस दहेज के आड़ में  

न जाने कितनी गुड़ियाँ,  

झुलस जाती है आग में  

क्यो हर बाप विदा कर देता  

उसे भेड़ियों के संसार में  

क्यों पीड़ा न दिखती हर माँ को  

उस मासूम बच्ची की आवाज में  

अरे मत कहो, उससे  

एडजेस्ट करलो  


क्यों सिखाते हो सहना हर बार,  

क्यों बुझाते हो चूल्हे पर उसका संसार?  

क्यों तोलते हो बेटी को रुपयों में,  

क्यों बेच देते हो सपनों को रस्मों में?  


पर सुन बेटी, एक बात याद रखना,  

_ये घर अब भी तुम्हारा है, न हो परेशान।_  

_अगर न रहा जाए तो वापस आ जाना,_  

_तेरा घर अब भी तेरा है, तेरे माँ-बाबा अब भी तेरे हैं।_  

*क्योंकि तू कोई पराई नहीं,*  

*तू इस घर की जान है, शान है।*  

*तेरी हँसी से ही ये आँगन महकता है,*  

*तेरे आँसू से तो ये छत भी दरकता है।*


वो भी तो चाहती है खुल के जीना,  

चाँद-सितारों से बातें करना,  

किताबों में अपना नाम लिखना,  

न कि अर्थी पर बस एक नाम मिटना।  


अब बहुत हुआ, अब बस करो,  

दहेज नहीं, दुआ दो।  

बेटी कोई बोझ नहीं,  

वो तो घर की रोशनी है,  

उसे जलाओ मत,  

उसे जलने दो, मगर शमाँ बनकर।

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