लहर
*लहर - जयशंकर प्रसाद*
बीती विभावरी जाग री!
अम्बर-पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा-नागरी।
खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई
मधु मुकुल नवल रस गागरी।
ऊषा सुनहले तीर बरसाती,
जय लक्ष्मी सी उदित होती,
उसके स्वागत में झूम-झूम
नाचती है तरु की पातरी।
तब प्रथम किरण का स्पर्श पाकर
पिघला होगा यह हिमगिरि का
मोती सा शीतल पानी!
निर्झर बनकर बह निकला होगा।
बदली का सुन्दर कुन्तल ज्यों
धरा पर बिखरा बिखरा सा,
वसुन्धरा ने दर्पण सा
देखा होगा अपना मुख।
*व्याख्या*
जयशंकर प्रसाद की कविता "लहर" छायावादी काव्य का अनुपम उदाहरण है। इसमें कवि ने प्रकृति के माध्यम से जीवन और आशा का संदेश दिया है।
*1. भावार्थ:*
कवि कहता है - "बीती हुई रात जाग जा!" भोर हो गई है। आकाश रूपी पनघट में ऊषा रूपी नारी तारों रूपी घड़े डुबो रही है। चारों ओर पक्षी चहक रहे हैं, पत्ते डोल रहे हैं और लताएँ मानो शहद रूपी रस से भरी गागर लेकर आई हैं।
सुनहरी किरणें ऐसे लगती हैं जैसे ऊषा सोने के तीर बरसा रही हो। उसकी शोभा लक्ष्मी जैसी है। पेड़ों के पत्ते उसके स्वागत में झूम रहे हैं। कवि कल्पना करता है कि सूर्य की पहली किरण पाकर हिमालय का बर्फ पिघल कर झरना बन गया होगा। बादलों केश पृथ्वी पर बिखरे हैं और धरती अपना मुख दर्पण में देख रही है।
*2. मुख्य संदेश:*
इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी हमें बताते हैं कि हर अंधकार के बाद प्रकाश आता है। निराशा के बाद आशा का सवेरा होता है। "लहर" हमें सिखाती है कि जीवन में रुको मत, बहते रहो। जैसे लहर आगे बढ़ती है वैसे ही हमें भी आगे बढ़ना चाहिए।
*3. विशेषता:*
भाषा तत्सम और संगीतात्मक है। प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। ऊषा, पेड़, लता सब जीवित लगते हैं। यही छायावाद की सबसे बड़ी पहचान है।
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