आँसू

शीर्षक: 'आँसू' - जो हर टूटे दिल की आवाज़ बन गई*

महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की 'आँसू' सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि *दर्द का महाकाव्य* है।

*क्या ख़ास है इस कविता में?*

महाकवि जयशंकर प्रसाद - 'आँसू' से 10 पंक्तियाँ*

1. _जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति-सी छायी

2. _दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई।।


3. अरे आँसू! तू क्यों आया?

4_सूखी आँखों में भर लाया, फिर वही पुरानी बातें

5_चिर दुखिया यह जीवन है, सुख की छाँह कहाँ मिलती है।_ 6._काँटों के इस पथ में, फूलों की राह कहाँ  तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन,


11. _विकल होकर नित्य चंचल, खोजता जब नींद के क्षण 

1. *वेदना को शब्द मिले:


   प्रसाद जी ने कहा था - _"यह करुण-कलित हृदय बेचारा"_. 'आँसू' में उन्होंने उस बेचारे दिल की सारी पीड़ा उड़ेल दी। पढ़ते-पढ़ते लगता है जैसे ये हमारे ही आँसू कागज़ पर उतर आए हैं।

2. *प्रेम और विरह का दर्शन:


   ये सिर्फ आशिक़-माशूक़ के बिछड़ने की कहानी नहीं है। ये आत्मा का परमात्मा से बिछड़ना है। इंसान का अपने 'असली स्व' से दूर हो जाना है। इसीलिए हर उम्र का इंसान इससे जुड़ जाता है।

3. *भाषा का जादू:


   _"जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति-सी छायी, 
   दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई"_ 
   देखो, पीड़ा को 'घनीभूत' और याद को 'मस्तक में छायी' - कितना गहरा बिम्ब है। प्रसाद जी की कलम से शब्द नहीं, चित्र निकलते थे।

4. *आँसू = कमज़ोरी नहीं, शक्ति है:


   पूरी कविता में प्रसाद जी बताते हैं कि रोना कमज़ोरी नहीं है। आँसू तो आत्मा को धोकर साफ़ कर देते हैं। _"तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन"_ - दुनिया के शोर में दिल की सुनना सिखाते हैं आँसू।

*मेरी पसंदीदा पंक्तियाँ:
_"चिर दुखिया यह जीवन है, सुख की छाँह कहाँ मिलती है। 
काँटों के इस पथ में, फूलों की राह कहाँ खिलती है।"_ 
कितनी सच्ची बात है न? पर इसके बाद भी कविता उम्मीद नहीं छोड़ती।

*आज के लिए क्यों ज़रूरी है 'आँसू'?
आज जब हम सब 'Strong दिखने' के चक्कर में अंदर ही अंदर घुट रहे हैं, 'आँसू' हमें कहती है - _"रो ले बेटा, हल्का हो जाएगा"_। Prasad जी 100 साल पहले ही Mental Health की बात कर गए थे।

*अंत में बस इतना:
'कामायनी' प्रसाद जी का दिमाग है, तो *'आँसू' उनका दिल है*। और दिल की बात हमेशा सीधी दिल में उतरती है।

अगर ज़िंदगी में कभी लगे कि कोई समझ नहीं रहा, तो 'आँसू' उठा लेना। लगेगा जैसे प्रसाद जी खुद कंधे पर हाथ रखकर कह रहे हैं - _"मैं हूँ  न ।


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