आज कलम मेरी (स्वरचित)

आज कलम मेरी*  
*लिख नहीं पा रही*  
*सोच मेरी उस चीख के आगे*  
*कुछ सोच नहीं पा रही*  

*मैं एक औरत हूँ,*  
*उसका दर्द बयां नहीं कर पा रही*  
*जब भी कलम उठाती हूँ कुछ लिखने को*  
*बस आँखों से आँसू*  
*और ज़ुबान पर*  
*आक्रोश ही आता है*  

*मात्र 13 साल की छोटी सी गुड़िया*  
*32 हाथों ने एक साथ उस पर वार किया*  
*कहाँ थी इंसानियत? कहाँ था कानून?*  

*इससे अच्छा बिटिया,*  
*तू कोख में ही रह जाती*  

*मत आना अब तू*  
*भारत की इस धरती पर*  
*यहाँ लड़कियों की कद्र नहीं*  
*यहाँ पूजते हैं बस देवी को*  
*मानते हैं ये देवी को*  
*मगर घर की औरतों को*  
*इज़्ज़त नहीं, बेटी को मान नहीं*  
*सम्मान नहीं*  

*बात-बात पर गाली*  
*और हर गाली में माँ, बहन*  

*कब तक चुप रहेंगे हम?*  
*कब तक सहेंगे ये ज़ुल्म?*  
*मिट्टी की मूर्ति पूज कर*  
*घर की बेटी को रुलाते हैं*  

*नहीं, अब और नहीं*  
*ये कलम अब तलवार बनेगी*  
*हर बेटी अपनी ढाल बनेगी*  
*और इस देश को बदल कर ही दम लेगी*  
*तब आएगी कोई बिटिया इस धरती पर*  
*जब यहाँ बेटी को भी देवी सा मान मिलेगा*  
*सम्मान मिलेगा, पहचान मिलेगी*

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