अग्रिम पथ पर -जयशंकर प्रसाद

अग्रिम पथ पर बढ़े चलो,
पीछे मुड़कर देखो न कभी।
जीवन की धारा में बहते,
रुको न, थको न, अरे कभी।

पग-पग पर कंटक बिछे हैं,
हैं अंधकार के गर्त गहरे।
फिर भी बढ़े चलो, बढ़े चलो,
तुम पथ के हो सच्चे प्रहरी।

आशा की किरण दिखाती है,
नव प्रभात का सुनहरा द्वार।
विश्वास रखो अपने मन में,
होगा एक दिन बेड़ा पार।

दुख-सुख की परवाह न करके,
कर्तव्य पथ पर डटे रहो।
मानवता का दीप जलाकर,
जग में उजियारा किए चलो।

व्याख्या*
प्रसाद जी इस कविता में हमें जीवन में आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं कि जीवन की राह में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ और अंधकार क्यों न हो, हमें पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए।

कवि हमें सिखाते हैं कि दुख-सुख की परवाह किए बिना अपने कर्तव्य पथ पर डटे रहो। आशा और विश्वास के साथ चलोगे तो एक दिन सफलता जरूर मिलेगी। हमें मानवता का दीप जलाकर संसार को प्रकाशित करना है।

*समीक्षा*

*भाव-पक्ष:
यह कविता कर्म, संघर्ष और आशावाद का संदेश देती है। निराशा के समय यह कविता संजीवनी का काम करती है। कवि का मानना है कि जीवन गतिशील है, रुकना मृत्यु के समान है।

*कला-पक्ष:
1.  *भाषा*: ओजपूर्ण, सरल और प्रभावशाली। "बढ़े चलो" की पुनरुक्ति से प्रेरणा दोगुनी हो गई है। 
2.  *अलंकार*: रूपक - "जीवन की धारा", "अंधकार के गर्त" 
3.  *संदेश*: यह कविता युवाओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।

*निष्कर्ष:
"अग्रिम पथ पर" जयशंकर प्रसाद की कालजयी रचना है जो हमें गिरकर उठना और आगे बढ़ना सिखाती है। यह कविता "लहर" की तरह ही आशा और नवजागरण का प्रतीक है।

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