कामायनी-श्रद्धा सर्ग

कविता का नाम:* कामायनी – श्रद्धा सर्ग 
*कवि:* पंडित जयशंकर प्रसाद जी

*सारांश-

प्रलय के बाद पूरी धरती पानी में डूब चुकी है। मनु नाम का एक आदमी अकेला एक पहाड़ की चोटी पर बैठा है। वो सब कुछ खो चुका है। उसका मन हार चुका है। उसे लगता है अब जीवन का कोई मतलब नहीं बचा।

तभी वहां श्रद्धा आती है। एक साधारण सी लड़की, लेकिन चेहरे पर उम्मीद की चमक लिए हुए।

श्रद्धा मनु के पास बैठती है और उससे कहती है, "तुम ऐसे हिम्मत मत हारो। प्रलय के बाद फिर से सृष्टि बनती है। तुम अकेले नहीं हो।"

वो मनु को समझाती है कि जीवन सिर्फ अपने बारे में सोचने का नाम नहीं है। जीवन है – प्यार करना, मेहनत करना, दूसरों के लिए जीना। जब इंसान दूसरों के काम आता है, तभी उसे असली सुख मिलता है।

श्रद्धा की बातों में इतनी ताकत थी कि जो मनु टूट चुका था, वो फिर से खड़ा हो गया। उसने नई दुनिया बसाने का फैसला किया।

सीख-

प्रसाद जी कहना चाहते हैं कि जिंदगी में जब सबसे बुरा समय आए, जब सब अंधेरा लगे, तब भी "श्रद्धा" यानी "विश्वास" को मत छोड़ना। वो विश्वास ही हमें दोबारा खड़ा करता है।

आज की भाषा में कहें तो ये कविता डिप्रेशन से बाहर निकलने और फिर से जीने की हिम्मत देने वाली कहानी है।

*
आखिरी में बस इतना कहूँगी कि 

_"जब दुनिया खत्म सी लगे, तब कोई श्रद्धा बनकर हाथ पकड़ लेती है और कहती है – 

उठो, अभी बहुत कुछ बाकी है।"_

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